सर्दी और बर्फ(Tungnath in Winter)

Route : Rishikesh - Chopta - Tungnath
Time : January 2015
Submitted By : Amit Arora
जैसे ही सर्दी का मौसम आता है तो संसार के कई हिस्सो मे कड़ाके की ठंड व कई देशो मे ढेर सारी बर्फ लाता है इस मौसम मे पहाड़ों की चोटियाँ दूध रूपी बर्फ मे पूर्णतया डूब जाती है। इस सुंदरता की कल्पना मात्र ही पहाड़ प्रमियों के मन मे हलचल उत्तपन्न करने लगती है। इस अदभूत द्रस्य की एक झलक पाने की उत्सुकता मेरे मन को बेचैन करने लगी।रविवार के साथ 26 जनवरी की छुट्टी को देखकर मेरे अरमानो की उड़ान को मानो जैसे पंख लग गए तथा मैंने अपने परम मित्र श्रीमन अरविंद बहुगुना जी से बर्फ की एक यात्रा का प्रस्ताव किया। फोन पर बातों की प्रतिकिर्या से एहसास हुआ की मानो मैंने उनके मन की बात कह दी हो। जनवरी के आखिरी हफ्ते मे चार दिनों की एक यात्रा की योजना के साथ हमने अपनी बातों को विराम दिया पर दर्शनीय स्थल अभी भी भविष्य की गर्त मे था।

अंतत धीरे धीरे साल की उत्सव वाली वो आखिरी रात आ गई जिसके बाद नए साल के पहले दिन का सूर्योदय होगा। ठंड बढ़ने लगी तथा सूर्य देवता के दर्शन भी दुर्लभ हो गए और देखते ही देखते यात्रा के दिन नजदीक आ गए। 
मैंने अपना ट्रेक्किग वाला बैग व अन्य आवश्यक सामानो को निकाल कर एक दिन के लिए मंद मंद आती सूर्य की किरणों मे सूखने के लिए रख दिया और अगले दिन 22 जनवरी को मै अपने शहर रुड़की के लिए रवाना हुआ। शाम के समय मै अरविंद जी से मिला, चाय की चुसकियों के साथ हमने यात्रा की जगह पर बाते की और अन्य दोस्तो की सवीकर्ती के साथ चोपता जाने की योजना को पक्का किया।
अगले दिन मैंने रुड़की के बाजार से कुछ जरूरी सामान खरीदे और अपना अपना बैग उठाकर 24 जनवरी की सुबह हम पाँच घर से चोपता के लिए निकाल पड़े। हमने हरिद्वार तक की यात्रा बस से प्रारम्भ की और वहाँ से आगे टॅक्सी लेकर ऋषिकेशए शिवपुरी व देवप्रयाग के रास्ते श्रीनगर गढ़वाल के लिए रवानाहो गए। हरिद्वार से गुजरते समय गंगा माँ के पहले दर्शन करते ही मन प्रफुल्लित हो उठा और क्षणभर के लिए मै हरिद्वार से जुड़ी यादों मे खो गया। टॅक्सी तेजी से ऋषिकेश की ओर बढ़ती गई। ऋषिकेश मे गंगा जी का फैलाता हुआ फाट देखते ही मन को असीम खुशी मिल गई। गंगा जी के किनारे किनारे मन मुग्ध करदेने वाली पहाड़ी सड़क शुरू हो गई। शिवपुरी आते ही मेरे मित्र ने अपनी राफ्टिंग का एक अनुभव बताना शुरू किया और सुनते सुनते पता ही नही चला कि श्रीनगर आ गया।

श्रीनगर मे श्रीमान लोकेश व श्रीमान सतीश हमारी बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहे थे। हम सभी ने लोकेश के घर प्रतिभोज किया और लगभग दो बजे सतीश जी की बोलेरों कर मे चोपता के लिए निकले। रुद्रपरयाग होते हुये अगस्तस्य मुनि पहुचे। यहां से हमने खाने पीने का कुछ समान खरीदा तथा स्थानीय लोगो से आगे के रास्ते की स्थिति की जानकारी ली और पता चला की चोपता तक नाही जा पाएंगे क्योंकि चोपता के आसपास काफी बर्फबारी हुई है। बर्फबारी वाली बात काफी रोमांचित कर देने वाली थी। पहाड़ों की घुमओ दार सड़कों पर हम धीमीगती से आगे बढ़ रहे थे। रास्ते मे सूर्यास्त का आनंद लेते हुये हम दुगल भिट्टा पहुंचे। रास्ते मे थोड़ी थोड़ी बर्फ मिली पर आगे की सड़क पूर्णतया बर्फ की सफ़ेद चादर से ढकी थी। हमने यहीं पर रात्री विश्राम का फैसला किया। अंधेरा गहराता जा रहा था ठंड बढ़ती जा रही थी पर चारो तरफ बर्फ से ढकी पहाड़ों की सफ़ेद चोटियों का द्रश्य बड़ा ही मनमोहक था। 

हमने होटल का कमरा बुक किया यहाँ पर स्थित इन सामान्य होटलो का अनुभव बम्बई महानगर के किसी भी पाँच सितारा होटल से ज्यादा आरामदायक था। सड़क किनारे स्थित एक साधारण से भोजनालय मे हमने चूल्हे के पास बैठकर रात्रीभोज किया। चूल्हे से उत्तपन्न होने वाला तापमान बहुत आरामदायक था और वहाँ से उठने को मन ही नही कर रहा था। दिल चाह रहा था कस से समय रुक जाए। रात मे सभी दोस्तो ने अपने अपने मनोरंजक किस्से सुनाये। भीड़भाड़ए चकचोंधए टेलिविजन व स्मार्ट मोबाइल की दुनियाँ से दूर बिताए ये पल जीवन मे कभी न भूल पाने वाली यादगार बन जाते है और बाद मे जब भी इन लम्हो की याद आती तो मन को एक असीम शांति दे जाती है। पूरी रात पहाड़ों की सुंदरता के खूबशूरत सपने आते रहे और जल्द ही सुबह आने को तैयार हो गई। हम बार बार रूम कि खिड़की से झांक कर बाहर अंधेरा छटने व चाय की दुकान खुलने का बेसब्री से इंतिज़ार कर रहे थे। छह बजे हमारे सब्र का बांध टूट गया और हम अपनी आइस स्टिकए गेटर व पानी की बोतल उठाकर कमरे से निकल पड़े। हमने भोजनालय के मास्टर सेफ को उठाया और चाय बनाने का आग्रह किया। उसने उठकर बड़े प्यार से हमारे लिए स्वादिष्ट चाय बनाई।

चाय पीकर मै और अरविंद जी चोपता होते हुये भगवान तुंगनाथ ट्रेक के लिए निकल पड़े। फिसलने वाले रास्तो पर पैर जमाते हुये छोटे छोटे कदमो से आगे बढ़ने लगे। सूर्योदय होने की आहट आने लगी और देखते ही देखते आकाश मे लालिमा छा गई व पहाड़ो की चोटियों से अंधकार रूपी पर्दा हटने लगा। एक ओर आकाश मे सूर्य की नन्ही नन्ही किरणे और दूसरी ओर बर्फ की दूधिया चादर से ढकी खूबसूरत चोटियों को देखकर लग रहा था मानो स्वर्ग की अप्सरा धरती पर उतर आई है। पहाड़ो पर बिखरी अदभूत सुंदरता को देखकर मन पागल हो हुटा और वो द्रश्य स्वर्ग की कल्पना से कहीं ज्यादा सुंदर था। प्रकर्ति की इस सुंदरता को निहारते हुए हम चोपता पहुंचे। चोपता मे सभी इमारतों की छत बर्फ की मोटी पार्त से ढकी थी। केवल एक भोजनालय खुला था। पहले से ही कुछ आदमी यहा उपस्थित थे। हमने भी अल्पविराम किया तथा दिलबर के हाथ की एक एक चाय पी और आगे की यात्रा प्रारम्भ की।हमारे कदम बर्फ से ढके रास्ते पर धीरे धीरे भगवान तुंगनाथ की ओर बढ़ने लगे। जैसे जैसे ऊपर बढ़ते गए एक के बाद एक सुन्दर द्रश्य दिखाई देने लगा। बर्फ को छु कर आते हवा के झोंको का स्पर्श शरीर को स्फूर्ति प्रदान कर रहा था लगभग चार फुट बर्फ के ऊपर चलने व चारो ओर के द्रश्यों को देखने का वो अदभूत आनंद आज भी सोचते ही मन को प्रफुल्लित कर जाता है। रास्ते के एक ओर लगी रेलिंग पूर्णतया बर्फ से ढकी थी जिससे कुछ जगह पर यह ट्रेक एडवेंचुरेस हो गया था। पर न जाने कोई अदर्ष्य शक्ति हमे अपनी ओर खीच रही थी और प्रकर्ति की असीम सुंदरता को देखते देखते हम भगवान तुंगनाथ के द्वार जा पहुचें।

मंदिर के आस पास लगभग 4 से 5 फीट बर्फ थी। सभी दुकाने व होटल बंद थे। मंदिर से कुछ पहले प्रवेश द्वार मे लगे घंटे की आवाज बहुत की अदभूत थी घंटे की आवाज की कुंज ऐसी लग रही थी मानो भगवान शिव की भगती मे लीन कोई साधू ॐ शब्द का उच्चारण कर रहा हो। मंदिर के सामने स्थापित बैल के प्रतिमा पूर्णतया अद्रश्य थी। दूध मे नहाये भगवान शिव के दर्शन पाकर मन गदगद हो गया। कुछ देर भगवान की गोद मे विश्राम करने के बाद दुगल भिट्टा के लिए वापस चल दिये। 

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