Nanda Devi RajJat 2014 (नंदा देवी राजजात)

Route : Van - Vedani Bugyal - Bhaguwasa - Roop Kund - Jyunragali - Shilasamudra - Lata Khopadi - Sutol
Duration : August - September 2014
Submitted By : Pramod Kala
१ सितम्बर २००० को नंदा देवी राजजात २००० के अंतिम बस स्टेशन लोहाजंग मे मैं और सहयात्री पंजीकरण स्थल पर पहुँच गए थे | अच्छे साथियों के साथ पहली बार इस यात्रा के सुखद अनुभवों के साथ यात्रा शकुशल पूर्ण इस विचार के साथ की कि यदि परिस्थियाँ अनुकूल रही तो अगली राजजात संभवत २०१२ में पुनः शामिल होंगे |
वर्ष २०१२ और २०१३ मे विभिन्न कारणों से यात्रा स्थगित होने के बाद २०१४ में यात्रा का आयोजन किया गया | माँ नंदा की असीम अनुकम्पा है की अच्छे साथियों के साथ यात्रा सुखद एवं आनंदमयी रही | पिछली यात्रा के सहयात्री व् इस प्रकार की यात्रा प्रथम बार करने वाले साथी इस दुर्गम क्षेत्र की यात्रा करने के लिए तैयार होकर २७ अगस्त १४ को कोटद्वार से टैक्सी से देवाल पहुंचे | रात्रि विश्राम स्टेट बैंक देवाल के मैनेजर श्री गुप्ता जी के सहयोग से हुआ और इन्ही के सहयोग से पोर्टर भी मिले |

२८ अगस्त को सुबह देवाल से चलते हुए कुछ साथी पैदल ही फल्दिया गाँव में देवी के दर्शनों हेतु चले गए जबकि में और कुछ साथी टैक्सी में ही चलते रहे | लोहाजंग जो पिछली यात्रा का अंतिम बस स्टॉप था यहाँ से भी आगे वाणं तक सड़क मार्ग ठीक था | समय पर वाणं पहुच कर जिन्होंने  बायोमेट्रिक पंजीकरण एवं मेडिकल नहीं करवाया था उनकी औपचारिकताएं भी पूर्ण की गयी  रात्रि विश्राम हेतु एक पुराने माकन में दो कमरे मिल गए | मंदिर प्रांगण में देर रात तक लाता गांव से आई भोटिया महिलाओं द्वारा पारम्परिक लिबास में गीत व् नृत्य का कार्यक्रम चलता रहा |
यात्रा के ही समय खुले ढाबों पर रात्रि का भोजन और फिर सुबह का नाश्ता कर अगले दिन २९ अगस्त को सुबह ट्रेक पर चलना शुरू | मेरे साथी थे श्री अतुल कुकरेती,  डॉ जे पी ध्यानी, मोनू बहुगुणा, अन्नू, थन्ना, मकान सिंह , बंटी और लोकेश | ग्रुप में सदस्यों के साथ श्री नौला शाही के नेतृत्व में बहादुरों की टीम सहायक के रूप में थी | वाण से चलकर शाम तक वेदनी बुग्याल पहुँचाने का कार्यक्रम था | लगभग ११ किमी कुछ चढ़ाई , उतराई जंगल से होते हुए चले | रास्ते में अस्थाई चाय  नाश्ते की दुकाने थी जिनपर रूककर उपलब्ध सामग्री का भरपूर आनंद लिया |
राजजात में शामिल होने वाले अधिकतर यात्री वेदनी की खूबसूरत वादियों के दर्शन कर वापस जाते हैं | इसी क्रम में इस मार्ग में काफी पूर्व परिचित मिले | काफी समय बाद इतना पैदल चलने से पहले दिन अधिक थकान होना स्वाभाविक था  | विभिन्न आयु वर्ग एवं कार्यक्षेत्र के साथी ग्रुप में थे अतः क्षमताएं भी अलग अलग थी  , कोई काफी पहले गंतब्य तक पहुंचे तो कुछ देर शाम ही पहुँच पाये | पहले पहुँचाने वाले साथियिों के साथ मैं भी था | यहाँ पर NIM के कैंप थे जहाँ पूर्व परिचित साथी  आमोद पंवार( उत्तरकाशी)  मिले | हंसमुख मिलनसार व् मदद के लिए तत्पर आमोद द्वारा NIM  के कैंप में हमें खाना खिलाया | इतनी चढ़ाई के बाद इस भोजन को कर जो तृप्ति हुई उसे बयां नहीं किया जा सकता | हम लोग अपनी जरुरत की खाद्य सामग्री जो थन्ना से मंगवाई थी एवं टेंट साथ लेकर चले थे फिर भी आमोद ने सुझाव दिया की आज रात भीड़ कम है अतः NIM  द्वारा लगाये टेस्ट में ही रहें सो हमें दो टेंट उपलब्ध हो गए जिसमे हमने अपना सामान रख दिया |
पिछले दिन जब देवाल से हम लोग चल रहे थे तो पौड़ी से पूर्व परिचित नफीस और बल्लू भी हमें मिल गए थे जो सरकार के भ्रामक प्रचार कि सभी पड़ावों में सरकार के द्वारा रहने और खाने की निशुल्क व्यवस्था है के बहकावे में आकर यात्रा कर रहे थे यहाँ से वो भी हमारे ग्रुप के साथ हो लिए | वेदनी बुग्याल जो हमेशा ही मुझे लुभाता रहा है एक कस्बे की तरह चहल पहल से भरा था | यहीं भोजन के लिए गायित्री परिवार के द्वारा लंगर लगा की अचछी व्यवस्था की गयी थी  आज इसी का लुत्फ़ लिया गया | रात काफी बारिस हुई टेंट में कही कहीं पानी टपक रहा था लेकिन रात कट ही गई |

३० अगस्त, आज यहीं आराम करना था आज यात्रा को गैरोली पाताल पहुँचना था मगर वहां जगह की कमी के कारण अधिकतर यात्री वेदनी ही पहुँचाने वाले थे अतः भीड़ अधिक होने की आशंका की देखते हुए सुबह ही जगह ढूंढ़ ली और टेंट लगा दिए | चूँकि टेंट इतने ही लेकर चले थे कि अपनी जरुरत पूरी हो जाये अतः चाहकर भी बल्लू और नफीस को टेंट में साथ नहीं रह सके | यहाँ उनके द्वारा प्लास्टिक शीट से काम चलाऊ टेंट हमारे नजदीक ही लगा दिया गया | शाम होते होते यह क़स्बा शहर में तब्दील हो चुका था  सरकारी घोषणाओं के भ्रम में पड़कर अधिकांश लोग बिना जरुरी संसाधनो के चल रहे थे  अतः अव्यस्था स्वाभाविक थी  शुक्र है हमें इन अव्यस्थाओं का सामना नहीं करना पड़ा  दिन में वेदनी टॉप में चढ़कर आली बुग्याल देखा ख़ूबसूरत ! आज का भोजन भी लंगर में किया |
३१ अगस्त २०१४, रात से ही दो साथी लोकेश और बंटी विभिन्न कारणों से वापस घर जाने का कार्यक्रम बना रहे थे| दोनों से ही सबके द्वारा यात्रा पूरी करने का आग्रह किया गया मगर लोकेश यहीं से घर वापस | सुबह नाश्ता कर सामान पैक कर आगे की दुर्गम यात्रा के लिए निकले | आज भगुवासा तक पहुँचने का कार्यक्रम था  सहयोगी बहादुरों को निर्देश दे दिए गए थे की आगे जल्दी चल कर किसी सुरक्षित स्थान पर टेंट लगा दिए जाएं | भगुवासा चूँकि इस यात्रा की अधिकतम ऊँचाई वाली कैंप साइट है जहाँ  कैंपिंग के लिए कम स्थान है अतः पिछली यात्रा के अनुभवों के आधार पर सही समय पर अपने टेंट के लिए स्थान ढूंढना आवश्यक था | वेदनी से चलकर पहले पातर नचौनियां पहुंचे| यहाँ सरकार  के द्वारा चाय , बिस्कुट की व्यवस्था की गई थी इसके पश्चात चढ़ाई कलुवा विनायक के लिए | नंदा देवी राजजात  में अधिक भीड़ भाड़ होने के कारण ही एक दूसरे का सहारा बनकर शायद ये चढ़ाइयां आसान बन जाती हैं | हमारे ग्रुप में कुछ ऐसे साथी भी थे जो पहली बार इस प्रकार की यात्रा में शामिल हो रहे थे अतः अपेक्षाकृत कुछ अनुभवी सदस्य होने के कारण मैं भी प्रयास कर रहा था कि नए सदस्यों का मनोबल न टूटे | कलुवा विनायक में मैं, अन्य साथी जो पीछे रह गए थे का इंतज़ार करने लगा  बंटी और मैं यहाँ से साथ साथ चलने लगे रास्ता लगभग सीधा लेकिन पथरीला था | ब्रह्म कमल भी अब दिखने लगे थे और उन्हें अकारण ही तोड़ने वाले यात्री भी | भगुवासा के शुरू में ही एक ढाबा बना था  जहाँ मेरे और बंटी  द्वारा कढ़ी चावल का मजा लिया गया | भूख मीठी या भोजन निःसंदेह भूख  अब समय था अपने बहादुरों को ढूंढने का जो सामान लेकर आगे आगे बढ़ चुके थे, ज्यादा वक़्त नहीं लगा दूर से पहचान लिए थे | यह देखकर आश्चर्य हुआ कि जिन बहादुरों को हम अनुभवहीन समझ रहे थे उनके द्वारा टेंट उपयुक्त सुरक्षित स्थान पर व्यस्थित तरीके से लगाये गए थे  पास ही पानी का स्रौत था |

इस दौरान वर्षा भी काफी हुई| डॉ ध्यानी एवं कुकरेतीजी को छोड़कर सभी साथी कैंप में सकुशल पहुँच गए थे ऐसे में उन्हें अंधेरे में ढूंढना काठी हो सकता था अतः अन्नू एवं एक बहादुर उन्हें ढूंढने वापस चले और कुछ समय बाद उन्हें साथ लेकर ही आये | दोनों काफी थके एवं भीगे हुए थे| बकौल डॉ ध्यानी" हम काफी भीग चुके थे एवं थक गए थे थकान व अँधेरे के कारण साथियों  को ढूंढना मुश्किल था हताश एक स्थान पर खड़े हो गए थे जब अन्नू और बहादुर दिखे तो ऐसा लगा की साक्षात भगवान के दर्शन हो गए " | लगभग ४००० मीटर की ऊंचाई पर इस कैंप साइट में कुछ साथियों को रात ठीक से नींद नहीं आई | यहाँ पर रात्रि भोजन बहादुरों द्वारा बनाया गया |

१ सितम्बर २०१५, सुबह जल्दी उठना था क्योंकि आज इस यात्रा के सर्वाधिक ऊँचे स्थानो रूपकुण्ड  और ज्यूंरागली की पर करना था जिसे जल्दी पर करना सुरक्षित होता है क्योंकि दोपहर बाद मौसम का कोई भरोसा नहीं | अतः सुबह जल्दी नित्य क्रिया से निवृत्त होकर जल्दी यात्रा शुरु कर दी | यहाँ से वनस्पति विहीन पथरीले रास्ते पर आगे बढ़ने लगे | यहाँ से कुछ हिमशिखर बहुत खूबसूरत लगते हैं | इस कैंप से रूपकुंड की दूरी महज़ २.३ किमी होगी लेकिन अधिक ऊंचाई के कारण एक एक कदम भारी लग रहा था बकौल मोनू" रूपकुंड पहुँचने के लिए अंतिम आधा किमी जिंदगी भर याद रहेगा जिंदगी का सबसे कठिन आधा किमी" |

एवेरेस्ट पर चढ़कर झंडे गाड़ देना हिमालय पर विजय पाना नहीं है उसके रहस्यों की खोज करना ही सही मायने में हिमालय पर विजय प्राप्त करना है | ऐसी ही है रहस्यमयी रूपकुंड जिसके रहस्यों पर से पर्दा उठान बाकी है  | रूपकुंड में पीछे छूट गए साथियों का इंतज़ार किया अधिकांश यात्री आगे निकल गए थे फिर शुरु हुई ज्यूंरागली की चढ़ाई , मगर रास्ता पिछली यात्रा के अपेक्षा अचछा एवं सुगम था  टॉप पर पहुँचकर डॉ ध्यानी और मैंने फोटो खिंचवाई एवं जल्दी ही दूसरी तरफ की ढलान में बढ़ने लगे| यहाँ से बहुत दूर शिलासमुद्र दिखाई दे रहा था  इन्ही खूबसूरतियों से अविभूत होकर ही शायद आदि पुरुषों ने इस तरह की यात्राएं प्रारम्भ की हों| अवर्णनीय! अविश्वसनीय ! काफी ढलान दूर तक फैली शिलासमुद्र की विस्तृत घाटी  इस ढलान पर उतरना चढ़ाई से कम था| सामने मंजिल दिख रही थी इसलिए रास्ता लम्बा लग रहा था | यहाँ भी वही टेंटों का शहर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते यात्री, बड़ी वेदना होती है | पर्यावरण को अपने अनुकूल ढालना कठिन है उस कोशिश में मनुष्य पर्यावरण को अपने हाथों विकृत करता है और फिर उसकी विकृति या प्रदूषण की मार झेलता है |

एक बार फिर तारीफ करनी पड़ेगी बहादुरों की, कैंप अचछी जगह पर था | आज यात्रा पातर नचौनियां थी अतः एक दिन अतिरिक्त शिलासमुद्र में ही रुकना था | यह स्थान अद्भुत आलौकिक है  हिमालय में अगणित भूस्वर्ग बिखरे दिखाई देते हैं |
ऊपर हिम था नीचे जल था,
एक तरल था एक सघन |
एक तत्त्व की ही प्रधानता,
कहो उसे जड़ या चेतन ||

(जय शंकर प्रसाद)

देर रात तक टॉर्च की रोशनी के सहारे ज्यूरांगली से शिलासमुद्र की ढलान पर उतरते यात्रियों को देखना अद्भुत अहसास था |

सितम्बर २०१४, मौसम साफ़ है आज यहीं विश्राम करना था अतः कोई जल्दी नहीं थी | सभी ने अपने गीले कपड़ों को धुप में सुखाया इस दौरान हेलीकाप्टर द्वारा खाद्य , पेय सामग्री गिराई गई| अधिकांश खराब हो जा रही थी | कई पूर्व परिचित लोगों से भी मुलाकात हुई| यहाँ भी अस्थाई भोजनालय हमारे टेंट के पास ही है | मुख्य दूकान मालिक पूरी तरह से व्यसायिक होने का प्रयास कर रहा था| १० रु प्रति पूरी कुछ ठीक से तली हुई पूरियां २० रु प्रति की दर से | सभी ने इस अभूतपूर्व नाश्ते का आनंद उन वादियों में लिया

यात्रा के प्रारम्भ से अब तक अपने बारे में ही सोचते रहे कभी उस संवेदनशील प्रकृति के बारे में सोचा ही नहीं जिसे इतना बड़ा जनमानस रौंदते हुए नुकसान पहुंचाते हुए आगे चल रहा था | अनावश्यक रूप से वनस्पतियों को जो क्षति पहुंचाई जा रही है, उसकी भरपाई शायद ही कभी हो पाये | यदि ब्रह्म कमलों का इसी तरह विनाश किया गया तो जल्द ही वे लुप्त हो जायेंगे और बच्चे इन्हे सिर्फ किस्से कहानियों चित्रों में ही देख पाएंगे अतः कुछ चित्र ब्रह्म कमल के साजों कर रखे हैं | इस तरह का अकारण नुकसान पहुँचाना समझ से परे है | क्या इस तरह की यात्रा का आयोजन बिना किसी नियम के करना चाहिए , इतना बड़ा सैलाब इतने अति संवेदनशील स्थान पर प्रकृति के नियमों की अवहेलना करते हुए बढ़ता जा रहा है |
चौसिंगा खाडू इस यात्रा के लिए कितना महत्वपूर्ण है यह नहीं कह सकते, पर पशु बलि का समर्थन ही तो है ये सब | खुद तो मारना नहीं है लेकिन मरने के हालातों में मूक जानवर को छोड़ना सोचनीय प्रश्न है जबकि समाज में अधिकाँशों द्वारा पशु बलि का विरोध किया जा रहा है | यात्रा का स्वरुप बदले जाने की आवश्कता है | कल होमकुण्ड जाकर सीधे लाता खोपड़ी उतरने का कार्यक्रम है कुछ साथी होमकुण्ड तक जाना चाह रहे हैं |
सितम्बर २०१४, सुबह उठकर पैकिंग नाश्ता और फिर एक लम्बी लाइन का हिस्सा बन गए  कुछ साथी यात्रा के साथ और कुछ चंदनिया घाट होते हुए लाता खोपड़ी  यहीं कैंप किया गया| अब रास्ता वनस्पतियों ऊँचे वृक्षों से होकर गुज़र रहा है  यहाँ पर कैंप साइट बहुत कम है अतः अधिकांश आगे बढ़ गए थे  लेकिन यहाँ पर भी काफी भीड़ थी  रात बारिश हुई |

सितम्बर २०१४, सुबह उठकर चलना शुरू  यह कीचड भरी चढ़ाई उतराई इस यात्रा की सबसे परेशान करने वाला रास्ता था| किसी तरह तांतड़ा गाँव और फिर सुतोल पुहंचे | अब जल्दी से जल्दी अपने अपने गंतब्यों तक पहुँचने का विचार कर हमसे आगे चले गए बंटी  को कर्णप्रयाग से गाड़ी भिजवाने को कहा | रात तक कर्णप्रयाग पहुंचने की उम्म्मीद में बढे थे कि अँधेरा शुरू होते ही पता चला कि गाडी कि लाइट ख़राब है | घाट नंदप्रयाग के बीच में सैंतोली गाँव में भले पुरुष श्री बचन सिंह डुंगरियाल के अति आग्रह पर उनके घर ही सभी रुके  उनके परिवार के द्वारा जो आतिथ्य सत्कार किया गया उसका धन्यवाद | सुबह जल्दी ही कर्णप्रयाग , श्रीनगर , पौड़ी , कोटद्वार| अपने अपने गंतब्यों कि ओर  घर पहुंचकर अपने कीचड़ पसीना  पानी धूल सने सामानो को अलग अलग किया | कुछ दिनों बाद सारा समान टेंट धुलवाकर सुखाकर व्यवस्थित कर दिया है| हिमालय शीघ्र ही बुलाएगा   |

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