Panpatia Col Trek

Route : Ukhimath - Madhymaheshwar - Mainagada Tal - Panpatia Col - Panpatia Glacier - Patvati Gully - Khairon Valley - Badrinath
Time : September 2012
Submitted By : Rajendra Rawat

पनपतिया ग्लेशियर यात्रा वृतांत

01. राजेन्द्र सिंह रावत बीर्इएल
02. रवि कादयान बीर्इएल
03. डा0 जे0 सी0 ध्यानी रा.सं.चिकित्सालय कोटद्वार
04. अमित हरियाणा (फूड एंव सप्लार्इ विभाग)
05. रमेश पंवार गाइड (भागीरथी टूर एंव ट्रैकर्स, उत्तरकाशी)
06. बलवंन्त पंवार टैक्नीकल गाइड
07. भजन सिंह रावत कुक
08. कविराज पोर्टर
09. सूरज
10. दिलबहादुर
11. कमल
हमारी तैयारियां अपने इस बहुप्रतिक्षित ट्रैक के लिए अपने अंतिम चरण में थी, लेकिन हमेशा की तरह इस बार भी कुछ बहुत अच्छा आगाज नहीं हो पाया। अंतिम क्षणों में इस बार हमारे मुख्य लीडर श्री शिव सिंह नेगी जी के साथ-साथ प्रमोद काला जी व अनु बहुगुणा भी हमारे साथ नहीं नहीं जा रहे थे। यह एक बहुत ही कष्टप्रद सूचना थी। लेकिन कभी न कभी तो छोटों को भी अपने कन्धों पर भार उठाना ही पडता है, इसलिए हम लोग एकदम आधी टीम के साथ ही तैयार हो गये। हमारी टीम में भी दो मेम्बर तो पहली बार हिमालयन टै्रक पर शामिल होने जा रहे थे। हम लोगों ने पनपतिया टै्रक को क्लाकवाइज करने की तैयारी करी थी, इस तरह का यह अपने आप में दूसरा प्रयास था। सामान्यत: टै्रकर्स इस टै्रक को एंटीक्लाकवाइज ही करते हैं। क्लाकवाइज करने में बहुत ही ज्यादा चढार्इ (लगभग 4500 फीट से 18900 फीट) तय करनी होती है, साथ ही क्रैवासेज वाले क्षेत्र में उतरना होता है।
पहला दिन(13.09.12)- कोटद्वार से हम लोग जीप द्वारा सीधे उनियाणा गांव पहुंचेे। इस बीच श्रीनगर में हमारे हमारे गाइड एंव पोर्टर्स भी साथ में मिले, जो कि सुबह उत्तरकाशी से चले थे। हमारे मुख्य लीडर श्री नेगी जी हमें श्रीनगर में हमारा हौसला बढाने के लिए विशेष रूप से आये। उखीमठ में हमें बारिश पडनी शुरू हुर्इ थी जो कि देर रात तक जारी रही, हम लोग तो उखीमठ से 25 किमी0 आगे उनियाणा गांव आ चुके थे, रात को ही हमने साथ आर्इ जीप को वापस उखीमठ भेज दिया था। रातभर बारिश चलती रही, मध्यमहेश्वर घाटी में असामान्य रूप से विकराल बादल फटने की अकसर घटनायें होती रहती हैं। इसके यहां घाटी में निशान देखे जा सकते हैं। 
दूसरा दिन(14.09.12)-बीती रात को उखीमठ में हुर्इ तबाही की अपुष्ट खबरों न सभी को झकझोर कर रख दिया, सभी लोगों के कोर्इ न कोर्इ रिश्तेदार उखीमठ में मौजूद थे सो कुशक्षेम पता करने की होड सी मची थी। हमने भी अपने ड्राइवर को फोन कर सिथति का जायजा लिया और राहत की सांस ली। यहां से हम लोग अब पैदल चलने लगे, रांसी पहुंचने पर हमारे पुराने पोर्टर्स भी हमें मिले और बहुत खुश हुए। रातभर की बारिश के कारण रांसी से आगे जगह-जगह पर भूस्खलन के कारण हमें अपना रास्ता ऊपर गांव से होकर करना पडा इसलिए हमें 2 घंटे ज्यादा समय लग गया। आज का अपना पडाव वनतोली में ही करने की ठानी, क्योंकि अब मौसम भी काफी खराब हो चला था। 
तीसरा दिन(15.09.12)-वनतोली से मध्यमहेश्वर का 10 किमी0 का रास्ता पूरा ही चढार्इ वाला है। रास्तेभर मौसम ने अच्छा साथ दिया बादलों की छाया में हमने चढार्इ लगभग पूरी कर ही ली थी कि यकायक बारिश शुरू हो गर्इ लेकिन हम लोग कुछ देर बाद ही मध्यमहेश्वर पहुंच गये। यहां पर रहने व खाने के लिए धर्मशाला के साथ-साथ ढाबे भी है। हम लोग धर्मशाला में रहे व सांयकालीन पूजा में शामिल होकर र्इश्वर से अपनी यात्रा की कुशलता के लिए प्रार्थना की।

चौथा दिन(16.09.12)-मौसम का मिजाज आज कुछ ठीक था सो हम लोग जल्दी ही तैयार होकर अपने गंतव्य की ओर चल पडे। आज से हमारी यात्रा भी कठिन होने जा रही थी, साथ ही हम लोग आबादी क्षेत्र से दूर भी जा रहे थे। लेकिन हमारे नये साथी जोश से भरे हुए थे, आखिर उनको ट्रैकिंग का इससे बेहतर मौका कहां मिलता। हमारे शरीर का रोम रोम अपनी फिटनेस का अन्दाजा देने लगा था, लेकिन परीक्षा तो अभी शुरू मात्र हुर्इ है। हमलोग लगातार उत्तर की ओर चढार्इ पर थे, अल्पाइन श्रेणी के पेड भी अब नीचे छूट चुके थे, और हम लोग चटटानी बीहड में लगातार ऊंचार्इ की ओर बढ रहे थे। जैसा कि पहाडों का मिजाज रहता है, मौसम ने फिर करवट ली और बारिश की फुहारें शुरू हो गर्इ साथ ही कोहरा छाने से रास्ते का अन्दाजा लगाना मुशिकल होने लगा। हमारे नये साथी पहली बार इस तरह के मौसम से रूबरू हुए, इसलिए उन्हे अब कहीं शेल्टर की आवश्यकता महसूस हुर्इ, अभी हम बमुशिकल 8 किमी0 ही चले थे। हालांकि हमारा आज का कैम्प कासनी ताल के पास था लेकिन बारिश के कारण हमें लगने लगा कि हमें जल्दी ही कैम्प कर लेना चाहिए, चूंकि मैं और रवि पहले भी इस रूट पर यहां तक आये हुए थे सो हमें अन्दाजा था कि हमारे आसपास ही क्षेत्रपाल नाम का एक छोटा सा मनिदर है जोकि एक भीमकाय चटटान के नीचे सिथत है, लेकिन कोहरे के कारण हमें अपनी सिथति का अन्दाजा लगाने में मुशिकल हो रही थी विजिबिलिटी 2 से 3 मी0 ही थी। फिर भी एक स्थान पर हमने थोडा रास्ते से हटकर मनिदर की तलाश की और जल्दी ही हम क्षेत्रपाल जी के मनिदर में थे। ठन्डी हवाओं के कारण हमने जल्दी से टेन्ट लगाना शुरू कर दिया, इस बीच बलवन्त ने गर्मागरम सूप देकर सबको फिर से एनेर्जी से भर दिया।बरसों पहले इस क्षेत्र में एक हेलीकाप्टर दुर्धटनाग्रस्त हो गया था जिसके कि अवशेष यत्र-तत्र बिखरे पडे हैं। कुछ तो यहां पर जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल भी हो रहे हैं मसलन पानी का पतनाला, फावडा, तवा इत्यादि। चूंकि यहां पर दो ही टेन्ट लगाने लायक जगह थी सो दो ही टेन्ट लगाये गये। मौसम का अन्दाजा लगाना अभी कुछ कठिन लग रहा था, सो हम लोग मानसिक रूप से यहां पर दो दिन तक रूकने के लिए तैयार हो गये। 

पांचवा दिन(17.09.12)-रातभर पूरी धाटी में बारिश होती रही, ऊंचार्इ पर पर भी यही हाल था, हम लोग मौसम के खुलने का इन्तजार करने के सिवाय कुछ नहीं कर सकते थे, समय गुजरता जा रहा था लेकिन मौसम नहीं खुला। इस जगह से आगे बढने के लिए एक बार 2-3 घंटे मौसम का साफ रहना अत्यावश्यक है, तभी हम लोग अपने अगले गंतव्य तक पहुंच सकते हैं। इंतजार करते-करते शाम ढल गर्इ तब कहीं धूप के दर्शन हुए। हमने अगले दिन के लिए किसी भी हाल में आगे बढने का निर्णय लिया। नेगी जी के साथ न होने से मुझे किसी भी निर्णय को लेने में बहुत दिक्कत महसूस हो रही थी, चूंकि इस तरह की हार्इ-एल्टीटयूड ट्रैक में मैं पहली बार अपनी टीम की अगुवार्इ कर रहा था सो ज्यादा फिक्रमंद भी होना लाजमी था पर पुराने अनुभव के कारण मैंने भी अपनी इस कमजोरी को अन्य साथियों का महसूस नहीं होने दिया। मेरा पूरा भरोसा हमारे पुराने गाइड रमेश पर था, हालांकि रमेश भी इस ट्रैक पर पहली बार ही आया है, उसके साथ उसका बडा भार्इ बलवंत इस रूट से वाकिफ है। लेकिन वह भी वाया मध्यमहेश्वर पहली बार इस रूट पर जायेगा वाया श्री बद्रीनाथ से मध्यमहेश्वर तो बलवंत पहले भी इस रूट पर आ चुका है। इस तरह कीे परिथितियों में दल का नेतृत्व करना बहुत कठिन लग रहा था। हमारा दूसरा दिन क्षेत्रपाल पडाव में ही बीत गया।
छठवां दिन(18.09.12)- मौसम ने साथ देना शुरू कर दिया था। जल्दी से पैकअप कर हम लोग पहले ही घंटे में कासनीखाल में पहुंच गये। कासनीखाल लगभग 13000 फीट की ऊंचार्इ पर है। इस क्षेत्र में चारों ओर ब्रह्राकमल का बागीचा नजर आता है। कासनीखाल से एक रास्ता पांडव सेरा-नंदीकुण्ड-घियाविनायक-बंशीनारायण होते हुए उर्गम घाटी जाता है व ऊपर पूर्व की ओर चटटानी क्षेत्र में पनपतिया ग्लेशियर जाता है। कुछ देर तिरछी ढलान में चलते हुए हम लोग एक बोल्डर स्लडिंग जोन में आ गये लगता था अभी पैरों के नीचे से बोल्डर खिसक पडेगा, लेकिन हम लोग सावधानी से आगे बढते रहे। लगभग 15000 फीट पर हमने कैम्प कर लिया। यहां से सुदूर दक्षिण-पशिचम में पौडी शहर व उत्तर में चौखम्भा पर्वत दिखार्इ देता है। 

सांतवां दिन(19.09.12)-आज आसमान बिल्कुल साफ नीला नजर आने लगा, और रास्ता कठिनतम होने जा रहा था। मौसम अगर इसी तरह साथ दे तो हम लोग जल्दी ही अपने अगले पडाव तक पहुंच जायेंगे। इस आस के साथ हम लोग पहले ही धंटे में एक शिला समुद्र से होते हुए चौखम्भा पर्वत के नीचे दक्षिण में एक पहाडी पर चढने लगे कि बलवंत ने हमें रूकने का इशारा कर दिया हम लोग शायद गलत दिशा से बढने लगे थे। बलवंत भी नीचे आ गया और हम लोग फिर से नीचे लगभग आधा किमी0 उतरने के बाद फिर से पहाडी के दक्षिणी ढाल पर पूर्व की ओर एक गलियारे की ओर चढने लगे। लगभग 16500 फीट पर सिथत यह पास हमारे पिछली रात की कैम्प साइट से साफ नजर आता है। इस चटटानी गलियारे को पार करने पर एक और पास नजर आता है, जो कि स्वजल सरोवर पास के नाम से जाना जाता है, साथ ही यहां से चौखम्भा पर्वत का खूबसूरत दक्षिण-पूर्वी नजारा भी दिखर्इ देता है। बर्फीली हवा अब असहनीय होने लगी, शरीर की गर्मी बनाये रखने के लिए चलने में ही भलार्इ थी। गलियारे ( दर्रा ) के ठीक नीचे स्वजल सरोवर है, पूरी तरह से चटटानों व बोल्डरों से धिरा इसका नीला हरा पानी किसी कौतूहल से कम नहीं है। बोल्डरों के बीच पानी कैसे रूका है यह सोचने का विषय है। लेकिन हम लोग सोचने की सिथति में तो बिल्कुल नहीं थे। बोल्डरों पर नीचे लगभग 1 किमी0 उतरने पर सरोवर की गहरार्इ का भी अन्दाजा लगने लगा, निशिचत रूप से इसकी औसत गहरार्इ 50 फीट से कम नहीं होगी। हमारा आज का पडाव सरोवर के पास ही था। रात को हिमस्खलन की आवाज से पूरी घाटी गुंजायमान हो रही थी। 

आठवां दिन(20.09.12)-सुबह मौसम एकदम साफ था, हमने जल्दी से पैकअप कर चलने की तैयारी कर ली। सभी का स्वास्थ्य अच्छा होना हमारे लिए बोनस पांइट था। आज से ही हमारी ग्लेशियर ट्रैकिंग शुरू होने जा रही थी और ऊंचार्इ भी लगातार बढ रही थी। स्वजल सरोवर से लगभग 1 किमी0 बोल्डरों में उतरने के बाद हम सभी ग्लेशियर के ऊपर चलने लगे, सभी एकसाथ जिग जैग होते हुए, सीढीनुमा ग्लेशियर पर चढने लगे ग्लेशियर का ग्रेडिएन्ट 45 से 60 के लगभग था, व ओपन क्रैवासेस कहीं-कहीं पर काफी चौडे व खतरनाक ढंग से फटे हुए नजर आ रहे थे। अभी तो यह हाल शुरूआत का था आगे जाने क्या नजारा होगा। लगातार ठंडी खुश्क चढार्इ पर चढते हुए हमारा एक पोर्टर निढाल होकर गिर पडा, संयोग से मैं व डा0 घ्यानी उसके ठीक पीछे चल रहे थे, तत्काल हमने उसे उठाकर ग्लूकोज का पानी दिया, कुछ चाकलेट खाने के बाद वह चल पडा, दरअसल उसके पास थोडा ज्यादा भार हो गया था। लगभग 1.5 किमी0 की चढार्इ के बाद हम सभी कुछ समय के लिए रूक गये। यहां पर से ग्लेशियर का ग्रेडिएन्ट 60 से 80 के लगभग था। बलवन्त आगे-आगे चलने लगा व उसके फुट प्रिन्ट पर सभी लोग आगे बढने लगे। इस तरह के तीखे ढलान पर बर्फ में चलना मुशिकल लग रहा था सो मैंने साथ में राकी फेस पर क्लाइंब कर समानान्तर आगे बढने का निर्णय लिया लगभग 800 मी0 की चढार्इ मैंने राकी फेस पर ही की लेकिन आगे राक पर बिना रोप के चढना खतरनाक था सो मैं भी फिर से स्नो पर ही चढने लगा। बलवन्त तो बहुत ऊपर पहुंच चुका था वह अब हमें एक बिन्दु के रूप ही नजर आ रहा था। हम लोग ऊपर देखने के बाद काफी हताश से होने लगे क्याेंकि स्नो में इस खडी चढार्इ पर चढना दुश्कर हो रहा था। एक जगह पर तीखी ढलान पर मैं लगभग 15-20 फुट नीचे फिसल पडा संयोगवश पैर नीचे की ओर ही रहे, एक बार फिर से प्रयास करने पर दोबारा कुछ आगे से फिर फिसल पडा। अब तो यह क्रम सभी पर चलने लगा, समझ में नहीे आ रहा था कि यह थकान का असर है या फिर हम ज्यादा खडी चढार्इ चढ रहे हैं। मुझे बलवन्त पर गुस्सा आ रहा था कि उसने हमें क्रैम्पोन पहनने की सलाह क्यों नहीं दी। हमारे 5 फुट ऊपर ही एक क्रैवास नजर आने से मैंने दूसरी दिशा से चढने का निर्णय लिया, मेरे पीछे-पीछे डा0 ध्यानी भी चल पडे इस बीच तेजी से मौसम खराब हो गया और बर्फवारी होने लगी, मैं व डा0 साहब सधे हुए कदमो से दूसरे रास्ते पर चलने लगे लेकिन डा साहब अचानक फिसल पडे, उन्हे ऊपर खींचने के बाद हम फिर चलने लगे कि डा साहब फिर से फिसल पडे, अब तो हमारी झल्लाहट चरम पर थी, एक तो गाइड बलवन्त का कुछ पता नहीं , मौसम भी खराब, थकान चरम पर और अब डा0 साहब भी अपने पैर ठीक से जमा नहीं पा रहे थे। बर्फवारी की तेजी बढने लगी, ऐसी ऊंचार्इ वाली जगहों पर यह स्वाभाविक है, लेकिन जिस जगह पर हम थे वहां पर कभी भी हिम स्खलन हो सकता है, यही सोचकर मैंने डा0 साहब को हिम्मत से काम लेने को कहा पर उन्हें इस खतरे को नहीं बताया, अन्यथा वो और भी घबरा जाते। हम दोनों अब राकी फेस के ठीक नीचे थे यहां से हम कभी बोल्डरों के ऊपर तो कभी स्नो पर होते हुए चढने लगे हमारे अन्य साथी पुराने गाइड वाले रास्ते पर ही धीरे-धीरे चढ रहे थे। कुछ देर बाद अचानक मौसम साफ हो गया अब तो धूप भी निकल पडी थी, इससे हमें अब अपनी सिथति का अन्दाजा हो गया था। रवि व गाइड हमें ऊपर से रास्ता बताने लगे, जिस जगह से हम दोनों चढ रहे थे वहां पर पहले भी एक रोप लटक रही थी, इससे लगता था हम सही जगह से चढ रहे है। लगभग 1 घंटे बाद हम दोनेां कैम्प साइट पर पहुंचे पर थकान के कारण कुछ भी बयां करने की सिथति में तो कतर्इ नहीं थे। रवि लोग हमारा हौसला बढा रहे थ लेकिन मैं बलवन्त की खबर लेना चाह रहा था, कुछ सोचकर मैंने शान्त रहना ही उचित समझा। हमारा शिविर लगभग 19000 फीट की ऊंचार्इ पर पनपतिया ग्लेशियर के दक्षिण पूर्वी छोर पर ग्लेशियर के ऊपर लगा था। 
उत्तर-पशिचम में चौखम्भा पर्वत का सम्पूर्ण दृश्य नजर आता है, दरअसल में पनपतिया ग्लेशियर घोडे की नाल के आकार में दक्षिण-पूर्व से पशिचम में गोल घूम कर उत्तर-पूर्व में ठीक सामने ही खत्म होता है। सम्पूर्ण ग्लेशियर लगभग समान ऊंचार्इ लिए हुए है (19000 फीट)। 7-8 किमी0 लम्बे इस ग्लेशियर में पहिए के स्पोक्स के समान हिडेन क्रैवासेस हैं, सभी स्पोक्स का केन्द्र खाडी में मिलता है। यहीं पर से एक नदी का भी उदगम स्त्रोत है।
नौवां दिन(21.09.12)- हमारे शिविर में सुबह के समय धूप बहुत देर में आने से हम लोग भी आगे नहीं बढ पाये। पैकअप करने से पहले टेन्टस का सूखना विशेषकर टेन्टस से बर्फ का हटना बहुत जरूरी है। 10 बजे तक ही हम लोग आगे बढ पाये। दूर से देखने में तो ग्लेशियर एक मैदान सा प्रतीत होता है लेकिन बर्फ के रिफलेक्शन के कारण दूर से सतह का ठीक से अन्दाजा लगा पाना मुशिकल हो रहा था। ग्लेशियर के ऊपर कर्इ टीले बने हैं जो कि कभी-कभी 70-100 मीटर से भी ज्यादा ऊंचार्इ तक हो जाते हैं। इन्हीं टीलों पर जब ऊपर चढना होता है तो बहुत ही ज्यादा कष्ट होता है। अब तक तो हम 1 घंटे में केवल आधा किमी0 ही चल पाये थे। धूप तेज होने से बर्फ पिघलने लगी थी और फिसलन बढने लगी, हमें ज्यादा डर केवल हिडेन क्रैवासेस से था। चूंकि आगे-आगे बलवन्त (गाइड) चल रहा था तो हम लोग भी थोडा निशिचंत थे। कर्इ जगहों पर बलवन्त ने क्रास मार्क किया था मतलब इधर खतरा है। और वास्तव में उधर क्रैवास का छेदनुमा ढका हुआ हिस्सा देखकर हम और भी सतर्क हो जाते। ग्लेशियर में लीक से हटकर चलने में बहुत ज्यादा खतरा होता है इसलिए बस एक दूसरे के पीछे लीक पर चलते रहो। आधा ग्लेशियर पार करने के बाद मौसम फिर से बदल गया और तेज हवा के साथ बर्फवारी होने लगी। अभी हम लोग एक टीले के तलहटी में थे यहां पर कुछ ज्यादा ही क्रैवासेस नजर आ रहे थे, सो हमें बहुत बार जिग-जैग कर आगे बढना पड रहा था जिससे बहुत थकान होने लगी, अभी हम लोग 19000 फीट की ही ऊंचार्इ पर चल रहे थे, बस थोडा परिवर्तन था तो मौसम और हमारी दिशा का हम अब उत्तर-पूर्व की दिशा में टीले पर ऊपर चढ रहे थे। समतल जगह पर आते ही बलवन्त हमारा इन्तजार करते मिला, गाइड के अनुसार मौसम को देखते हुए हमें यहीं पर कैंम्प कर लेना चाहिए, सभी लोग बेहद थक चुके थे सो हमने फिर से ग्लेशियर के ऊपर ही कैम्प लगा लिया। कुछ ही देर में मौसम फिर से खुल गया जो कि फोटाग्राफी के लिए अच्छा था।

दसवां दिन(22.09.12)- आज हमने जल्दी पैकअप कर लिया था कारण साफ था एक तो इस जगह पर जल्दी धूप आ जाती है दूसरा आगे रास्ते में लगातार ढलान है और एवलांच के चांस बन सकते हैं। मन के अन्दर डर तो लग ही रहा था लेकिन साथ में डा0 ध्यानी का भी हमें ही खयाल रखना था, सही मायनों में डा0 साहब जोश ही जोश में हमारे साथ चल पडे थे लेकिन यहां पर क्या परिसिथतियां होती हैं वो पहली बार इससे रूबरू हुए थे। अब उन्हे सुरक्षित घर तक लाना हमारी जिम्मेदारी थी। बलवन्त हमेशा की तरह आगे-आगे रास्ता बनाते हुए चलने लगा। कुछ दूर चलने के बाद ढलान एकदम 80 की हो गर्इ साथ ही एक ओपन क्रैवास ने हमारा रास्ता रोक लिए ढलान पर क्रैवास ग्लेशियर की पूरी चौडार्इ में फैला हुआ था। बलवन्त ने अपनी आइस एक्स से एक दो जगहों पर क्रैवास को पार करने की कोशिश की लेकिन शायद ज्यादा खतरा भांपकर उसने दूसरी जगह चुनने का फैसला किया। अब जो जगह थी वो कुछ ज्यादा ही ढलान पर थी जरा भी चूक का मतलब साफ था या तो क्रैवास के अन्दर या नीचे फिसलते हुए किसी दूसरे क्रैवास के अन्दर। बलवन्त क्रैवास के निचले छोर पर खडा होकर हमें पार करवाने लगा दन जगहों पर एक नहीं दो-दो आइस एक्स की जरूरत होने लगी। हमने तो डेंजर जोन पार कर लिया था लेकिन मुझे अपने पोर्टरस की भी फिक्र थी बस मैं मन ही मन उनको इस जगह से सही सलामत नीचे आने की दुआ कर रहा था। बलवन्त तो तेजी से नीचे 1 किमी0 दूर उतर गया और हमें भी जल्दी उतरने को कहने लगा। जब हम नीचे पहुंच गये तो बलवन्त कहने लगा ये एवलांच जोन था। बहरहाल हम लोग मुख्य पनपतिया ग्लेशियर के एक कोने में आकर खडी चटटानी हिस्से में आ गये थे, जो कि पार्वती पर्वत के ठीक नीचे है। यहां से और नीचे पनपतिया ग्लेशियर का मुहाना था हमें अभी चटटानी हिस्से को पार कर मुहाने तक पहुंचना था। यहां पर पूजा अर्चना करने के बाद हम लोग चटटानी हिस्से पर एक संकरी दरार वाले स्थान से बिना रोप के ही नीचे उतरते चले गये। अब बर्फ की जगह लूज बोल्डरों ने ले ली थी, बोल्डरों पर नीचे ढलान में उतरना बहुत मुशिकल होता है। धीरे-धीरे सभी ग्लेशियर के मुहाने पर आ गये। यहां पर ग्लेशियर सलेटी रंग का स्टील के समान ठोस पहाड लग रहां था। लगभग 750 मी0 लम्बे ग्लेशियर को पार कर अब हम मोरिन के ऊपर घाटी में उतरने लगे। घाटी में मारिन बहुत ही असिथर सा लग रहा था सो हमें अपने शिविर के लिए एक सुरक्षित सा स्थान चाहिए था, लेकिन घाटी में चलते-चलते शाम ढलने को आ गर्इ पर कैम्प साइट नहीं मिल पार्इ। घाटी में मोरिन के अलावा ढलानें भी बहुत ही असुरक्षित लग रहीं थीं। मजबूरन हमें एक स्थान पर कैम्प करना ही पडा क्योंकि डा0 साहब अब एक भी कदम आने बढाने की सिथति में नहीं रह गये थे, हालांकि रवि मेंरे और गाइड के इस फैसले से असहमत था लेकिन सभी का ध्यान रखना हमारी प्राथमिकता थी। इसमें कोर्इ शक नहीं किइस स्थान पर बीते एक या दो दिन में भूस्खलन हुआ था लेकिन आसपास कोर्इ और भी तो जगह नजर नहीं आ रही थी ऊपर से थकान के मारे सभी का बुरा हाल था, इस कैम्प साइट में पानी भी नजदीक था। बस रात को बारिश न हो र्इश्वर से यही प्रार्थना करते रहे।
ग्यारवां दिन(23.09.12)-रात बिना किसी विघ्न बाधा के गुजर गर्इ, अन्यथा डर लग रहा था कि कहीं बारिश ना हो जाय, क्योंकि कैम्प साइट कम से कम दो तरफ से तो खतरे की जद में ही था। बहरहाल पैकअप जल्दी से कर हमने आगे कूच किया। शाम के वक्त तो लग रहा था कि घाटी में हरियाली बस 1 किमी0 दूर ही शुरू हो जायेगी परन्तु हमें अभी भी चलते हुए 2 घंटे हो गये पर हम लोग बस मोरिन को छोड ही पाये हैं। कैम्प साइट से यहां तक का सफर बेहद जोखिम भरा है, घाटी के बायीं ओर के ढाल पर लूज बोल्डरों के साथ चलना एक बडी चुनौती है, दांयी ओर जा नहीं सकते मोरिन में चलना और भी कठिन था। 
हमारा तय कार्यक्रम श्री बद्रीनाथ वाया ब्रमखाल जाने का था लेकिन ब्रमखाल की चढार्इ चढने के लिए हमें कम से कम 4 घंटे चाहिए थे। हम घाटी में लगभग 13000 से 13500 फीट पर हाेंगे जबकि ब्रमखाल की ऊंचार्इ लगभग 15000 फीट है, साथ ही खडी चढार्इ और रास्ता भी न होने से यह और भी दुष्कर होने वाला था, सभी के चेहरों पर अब ट्रैकिंग की थकान और बर्फीले थपेडों के निशान साफ नजर आने लगे थे। अगर हम ब्रमखाल वाला रास्ता चुनते हैं तो हमें निशिचत रूप से बद्रीधाम से पहले एह पडाव तो करना ही पडेगा। क्योंकि ऊंचार्इ पर मौसम सुबह 11 बजे के बाद खराब होना निशिचत रहता हैं। यही सब बातें आपस में विचार कर हमने एकमत से सीधे घाटी में ही उतरना सुरक्षित व ठीक समझा। खूबसूरत घाटी में उतरते-उतरते भी हमें शाम के 5 बज गये। गांव तक पंहुचने के बाद बडी राहत मिली, हां गांव में कर्इ सारे लोग किसी धार्मिक अनुष्ठान में आये थे, उन्होने हमें पहाड की ककडी खिलाकर हमारा स्वागत किया। लेकिन कुछ ऐसे भी थे जो हमारी जांच पडताल में लग गये, वन विभाग की परमिशन, पोर्टर एजेन्सी का रजिस्ट्रेशन वगैरह वगैरह कर्इ तरह की बातों में उलझाकर हमारी सारी ट्रैकिंग का मजा ही किरकिरा करने पर तुले थे। अन्त में हमने उन्हें जोशीमठ के दो ट्रैकिंग एजेन्सी के नाम व अपनी तरफ से की गर्इ बातचीत का हवाला देकर उनकी कुछ परेशानियों को कम किया व अन्त में खुद अपने उत्तराखण्ड का होने के नाते उन्हें छिडका तो वे रास्ते पर आ गये। किसी तरह हम शाम 6 बजे रोड हेड पर लामबग्गड पहुंच गये, यहां से समय पर एक मैक्स टिप्पर में हम श्री बद्रीधाम पहुंच गये। बद्रीनाथा पहुचते ही सबने पहले अपने घरों में फोन कर अपनी कुशलता की खबर दी फिर हमने अगले दिन सुबह सबेरे निकलने का कर्यक्रम बनाकर श्रीनगर के लिए बस की सीट बुक करवा लीं। 
श्री बद्रीनाथ जी के दर्शन से पहले सबने तप्त कुण्ड में खूब स्नान किया व अपने थके हुए शरीर को गर्म पानी की सेक दी। स्नान के बाद थकान कहां गायब हुर्इ कुछ पता ही नहीं चला। आज का दिन यूं तो सभी के लिए बहुत यादगार था लेकिन डा ध्यानी जी के लिए यह और भी ज्यादा मायने रखता था यह उनका पहला ही प्रयास था जो कि सफल रहा। हम सभी ने भगवान का शुक्रिया अदा किया कि हमारे पूरे ग्रुप को सही सलामत यहां तक पंहुचा दिया। 

बाहरवां दिन(24.09.12)-सुबह सबेरे ही हम बस में पहुंच गये थे। श्रीनगर तक हम लोग कब पहुंचेे पता ही नहीं चला, ट्रैकिंग की थकान के मारे सभी लोग बस में बेसुध होकर सो गये थे। श्रीनगर में हमने कोटद्वार से ही टैक्सी मंगवा ली थी इसलिए रात को हम लोग 9 बजे अपने-अपने घरों में सकुशल पहुंच गये

Copyright 2006-2015, All Rights reserved to Garhwalhills.com